Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
लोभान्धकारोपरमो लोकलम्पटतां गतः ।
अघनत्वघनाभोगो हा शेते सुखमात्मवान् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
सुकृत्रिम
भ्रान्तिमात्र यह दृश्य मिथ्या ही प्रतीत होता हे चित् की चमत्कृति ही इसका वास्तविक स्वरूप हे । तत्त्वज्ञ
की दृष्टि में तो यह अकृत्रिम सन्मात्र ही है