Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
अनन्तदुःखमाशान्तमशान्तं जनतास्थितौ ।
अबहिर्मुखमत्योगि हा शेते सुखमात्मवान् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
यह प्रपंच चिरस्थायी मनोरथरूप ही हे, सृष्टि और
प्रलय की भ्रान्ति इससे अतिरिक्त नहीं है । उसके वास्तविक स्वभाव का स्फुरण ज्ञान है ओर भ्रान्ति के
आकार से इसका स्फुरण अज्ञान है, ऐसा समझना चाहिये