Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
अणीयसामणीयांसं स्थविष्ठं च स्थवीयसाम् ।
कृत्वात्मानं नभःशय्यं हा शेते सुखमात्मवान् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे दुश्यशून्य आत्मा में सुषुप्तिके
बाद स्वप्न देखा जाता है वैसे ही माया से उपहित ब्रह्मात्मा तुरन्त ही दृश्य बनकर बिना कारण ही
आविर्भूत होता है यों देखा गया है । पीछे वह अर्थक्रियाव्यवस्था द्वारा कार्यकारणभावादि नियति को
प्राप्त होता है