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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

कुर्वन्संहारसर्गौघानकुर्वंश्च कथंचन । परमालोकशय्यायां हा शेते सुखमात्मवान् ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

चित्‌ के स्वभाव का ही स्पष्टीकरण करते हैं। आकाशमात्ररूप (शून्यरूप) यह चित्‌धातु ऐसा ही है जो कि चित्स्वरूप होनेपर भी यह इस प्रकार जगत्‌ के रूप से स्फुरित होता है