Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
संसारनिचयस्वप्नं परिज्ञाय सुषुप्तताम् ।
नयन्प्रकटदिग्दीर्घां हा शेते सुखमात्मवान् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
पहले अबुद्धिपूर्वक दृश्याकार का भान होने से
दृश्यभूत उस चिदात्मा ने पीछे अपने में अतीतरूपसे प्रतीत में स्मृति आदि की कल्पनारूप, वर्तमान
के रूपसे स्फुरित में पृथ्वी आदि और पृथ्वी आदि बुद्धि की कल्पनारूप अनेक संज्ञाओं की कल्पना
की। ऐसी परिस्थिति में अविभक्त तात्कालिक प्रतिभास में वह सम्पूर्ण बुद्धि आदि विभाग कल्पनामात्र
ही हैं