Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 52
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verse 52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 52
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हिन्दी अर्थ
चिन्मय आकाश में ही जो चिन्मय
आकाश स्फुरण है उसी ने उसे ही जगत् जाना, बोध होने के उपरान्त वह जगत् कहाँ है ?