Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 51
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 51
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हिन्दी अर्थ
इस रीति से यह विस्तारयुक्त जगत् बिना कारण का ही है । सृष्टि के आरम्भ में स्वप्न के तुल्य
चिदाकाश में चिदाकाश ही विकारयुक्त-सा प्रतीत होता है