Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verses 48–50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verses 48–50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 48-50
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हिन्दी अर्थ
यही इन्द्रियों का संघात है, यही पुर्यष्टक कही गई हैं, यहाँपर यही आतिवाहिक शरीर तथा
आधिभौतिक शरीर है । मैं ब्रह्मा हूँ, मैं शंकर हूँ, मैं विष्णु हूँ, मैं सूर्य हूँ, यह बाह्य हे, यह आभ्यन्तर
है, यह सृष्टि है, यह जगत् है इत्यादि कल्पनाजाल अतिनिर्मल चिदाकाश ही है । इसलिए ये
अज्ञानियों द्वारा कथित पदार्थ राशियाँ कहाँ ? स्मृति कहाँ और द्वैत तथा द्वित कहाँ ?