Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 57
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हिन्दी अर्थ
शून्यरूप यह दृश्य तनिक भी
कुछ नहीं है ।पूर्णसागर में धूलि (विना भीगा रजकरण) कहाँ ? वैसे ही परमाकाश में दृश्य का अस्तित्व
कहाँ ?