Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 58

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 58

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अथवा जो यह दुश्य-सा कुछ स्फुरित होता है वह चेत्यभिन्न चिन्मात्र ही हे । चेत्य रहित होने से अपने से भिन्न दूसरे को प्रकाशित न करता हुआ ही शान्त वह स्वमात्रप्रकाश होकर अपने स्वरूपमें इस प्रकार का स्थित हे