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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । चिद्व्योमैकान्तनिष्ठत्वात्प्रयत्नेन विना सुखम् । न वेत्ति शुद्धबोधात्मा यः स विश्रान्त उच्यते ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे केवल दिखाई देनेवाला चित्रलिखित जगत्‌ केवल दीवारमात्र है वैसे ही चित्‌ में आभासमात्र (स्फुरणमात्र) यह जगत्‌ चिदाकाशमात्रस्वरूप ही है