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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 169, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 169, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 169 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

सर्व एव परिक्षीणाः संदेहा यस्य वस्तुतः । सर्वार्थेषु विवेकेन स विश्रान्तः परे पदे ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे पूर्वोक्त वृक्ष, सागर आदि के वृत्तान्त में अबुद्धिपूर्वक प्रवृत्त हुआ भी शाखा, आवर्तं आदि कार्य नियतिवश तुल्य देह की गठनवाला होता है वैसे ही चित्‌ में सृष्टिरूपी कार्य भी तुल्य शरीर संगठनवाला होगा, इसलिए उसके वास्ते भी बुद्धिपूर्वकता की आवश्यकता नहीं है, यह अर्थ हे