Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 17, Verse 14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 17, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

देहादहंत्वमनवाप्तवतो विचारैश्चिद्व्योममात्रवपुषो वपुषोऽथ वोच्चैः । नाहंत्वबीजजठरादसतोऽभ्युदेति संसारवृक्ष इह बोधमहाग्निदग्धात् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह अविचार के फल सर्वत्र अनिर्मोक्ष को बतनाकर अब विचार के फल मोक्ष को बतनाते हैं। श्रवण आदि विचारों से तत्त्ववोध होने पर चिदाकाशमात्र शरीरधारी जीवनमुक्त पुरुष के अहन्ता को न प्राप्त किये हुए विद्यमान भी शरीर से या निरतिशयानन्द पद में प्रतिष्ठित हुए विदेहयुक्त पुरुष के बोधरूपी महाग्नि से दग्ध हुए असदूभूत अहन्तारूपी बीज के जठर से यह संसाररूपी वृक्ष फिर कहीं नहीं पैदा होता