Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 18, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 18, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 18 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
मरणं सर्वनाशात्म न कदाचन विद्यते ।
स्वसंकल्पान्तरस्थैर्यं मृतिरित्यभिधीयते ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
देहोऽस्त्यहन्त्वकणिकान्तरथेषद्रश्य्तवित्यरीत इति बुद्चिद्रशैव द्रष्टम्“ यह जो ऊपर कहा
गया है, उसमे कैसे और कित तरह की बुद्धिद्ष्टि हैं 2 इन दोनों का मृत जीव के वास्ननामय अनन्त
जगत् के व्युत्पादन द्वारा समर्थन करने के लिए भ्रूगिका रचते हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, पामर मन ही, बुद्धि, अहंकार आदि समस्त
वस्तुओं के नाश को मरणरूप से समझते हैं, वह वास्तव में मरण स्वरूप नहीं है । यदि वैसा मान
लिया जाय, तो कृतहानि आदि दोषों की प्राप्ति अवश्य होने लगेगी । किन्तु मनुष्यादि शरीरो में
आत्मभाव के कारण प्रारब्ध का क्षय होने पर उसके अनुरूप संकल्प के तिरोभाव के बाद देवादिशरीर
में अहंभावादि के जनक कर्म की उत्पत्ति हो जाने पर उसके अनुरूप अपने दूसरे संकल्प का, उसके
भोजक अदृष्ट क्षयपर्यन्त स्थिर रहना ही, मरण कहलाता है यानी अपने सम्पूर्ण संकल्पो का
रूपान्तर में स्थित रहना ही मृत्यु है
सर्ग सन्दर्भ
सनत्रहवाँ सर्ग समाप्त अठारहवाँ सर्ग सर्वत्र आकाश में पवन द्वारा उड़ाये जा रहे मृत जीव के मन में स्थित अनन्त जगत् का वर्णन ।