Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 17, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 17, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
अहंतापुटकोड्डीनो ब्रह्मवीरबलेरितः ।
अहमित्यर्थपाषाणो न जाने क्वाशु गच्छति ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
अन्तिम स्राक्षात्काखृत्ति में आरढ़ हुआ ब्रह्म ही अज्ञान, अहंकार आदि के निस में समर्थ हैं,
इस आशय से कहते हैं ।
अहन्तारूप प्रमातारूपी यन्त्रपुटक से आविर्भूत ब्रह्मसाक्षात्काररूपी वीर के बल से फेंका गया
अहमादि दृश्यपदार्थरूपी पाषाण न जाने कहाँ शीघ्र उड़कर चला जाता है