Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 17, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 17, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
अहंतापुटकोड्डीनपरबोधबलेरितः ।
अहमित्यर्थपाषाणो न जाने क्वाशु गच्छति ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
साधन सम्यन्न पुरुष को श्रवण आदि के द्वारा ज्ञानोदय होने पर व्रह्म से अतिरिक्त अहमर्थ
का, बाधसे अस्त्व छी पर्यवसित होता है, इस आशय से कहते हैं /
श्रवण आदि के द्वारा ज्ञाननिर्मथन के अभ्यास से अहन्तारूप प्रमातारूपी यन्त्र के पुटक
से अग्निज्वाला की नाईं आविर्भूत परब्रह्म साक्षात्काररूपी बोध के बल से फेंका गया अहमादि
दृश्य पदार्थरूपी पाषाण, अग्नियन्त्र द्वारा फेंके गये पाषाण की तरह, उड़कर शीघ्र ही न जाने
कहाँ चला जाता है