Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 17, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 17, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
अनहंवेदनाभ्यासात्समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
भूत्वा शान्तभवापीडो न नरः परिताम्यति ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
काम का उपरम हो जाने पर लोभ आदि दोषों के क्षय से वैराग्य आदि सम्पत्ति द्वारा सम्पूर्ण
मानिक ढु:खें का क्षय हो जाता हैं, यह कहते हैं ।
अनहंभावज्ञान के अभ्यास से ढेला, पत्थर और सुवर्ण को एक-सा समझनेवाला मनुष्य
सांसारिक पीड़ाओं से शान्त होकर फिर किसी की इच्छा नहीं करता