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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 17, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 17, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । अनहंवेदनादेवं शुभाशुभफलप्रदा । संसारफलिनी नूनमिच्छान्तरुपशाम्यति ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण स्रंग्रति का मूल काम ही हैं, इसलिए अनहंभाव द्वारा सवस पहले उक्ती की निवृत्ति कहते हैं / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, इस तरह अनहंभाव के ज्ञान से शुभ और अशुभ फल देनेवाली तथा संसाररूप फल से परिपूर्ण इच्छा अन्तःकरण में ही शान्त हो जाती है, यह निश्चित है

सर्ग सन्दर्भ

सोलहवाँ सर्ग समाप्त सत्रहवाँ सर्ग अनहंभावरूप अग्नि से अहंभावरूप बीज के दग्ध हो जाने पर देहादिसंसार का पूर्णरूप से बाध हो जाने के बाद यह संसार बिलकुल मिथ्या भासने लगता है, यह वर्णन।