Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 17, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 17, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
अहमर्थहिमं त्वन्तरनहंता चिदर्चिषा ।
उड्डीयेव विलीनं सन्न जाने क्वाशु गच्छति ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा अनहंभावनावृत्ति में प्रतिफालित चिति से ही अहन्ता का नाश होता है, यही पक्ष रहे,
इस आशय से कहते हैं ।
अहमर्थरूप हिम अनहंभावात्मक चितिरूपी अग्नि से भीतर विलीन होकर मानों उड़ करके न
जाने कहाँ शीघ्र चला जाता है