Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 17, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 17, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 17 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
अहंरसो विलीनोन्तरनहंताचिदर्चिषा ।
शरीरपर्णादुद्वर्णान्न जाने क्वाशु गच्छति ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
अनहंभावात्मक चितिरूपी अग्नि की ज्वाला से ब्रह्मविद्या के
अधिकारी उत्कृष्ट ब्राह्मण आदि वर्ण तथा परिपाक के कारण पाण्डुवर्ण शरीररूपी पत्ते से अहंभावरूप
रस अन्तःकरण में ही गल कर न जाने शीघ्र कहाँ चला जाता है