Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
जनं प्रियंवदं कुर्वत्प्रियमेव समाचरत् ।
पेशलं मधुरं स्निग्धमक्षुब्धमुदिताशयम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
वे शुद्धचिद्रूप भास्कर चैत्य ओर चिदाकाश से यानी दृश्य
और द्रष्टा से शून्य स्वचित्ताकाश में नित्य उदित होकर दीप्त होते हैं, संसार में कहीं पर नहीं रहते