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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 16

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

विशेषविद्यावैदग्ध्यवादवन्द्यविनोदनम् । समानकुलशीलत्वाद्द्विधाभाव इव स्थितम् ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

अविद्यारूपी अन्धकार में विविध व्यवहार कर रहे अतएव उल्लू के तुल्य सकल भूतो की जो अविद्या की अस्तमयरूप रात्रि है वह परम बोध है, परम शान्ति हे । उसमें ज्ञानी एकरसरूप से स्थित रहता है