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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

पुत्रदारद्विजातिस्त्रीभृत्यबन्धुजनैः सह । शुभभोजनपानार्हमुत्तमश्लाघ्यसंगति ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

सर्वकर्मसंन्यास भी उसका लक्षण है, ऐसा कहते है। हे रघुद्रह, जो सकल कर्मो का अनादर कर (त्याग कर) स्वात्मा में ही स्थित रहता है वह आत्माराम (अपने में ही क्रीडा करनेवाला) कहा गया है, वह जड नहीं है