Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verse 19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
भोगादिबद्धतृष्णत्वं दुःखदं विनिवारयत् ।
सुस्निग्धसंकथोदारं समाश्वासोत्तमास्पदम् ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
जन्म, जरा आदि संसारक्लेश से
निर्मुक्त होकर इस संसार-सागर के पार पहुँचा हुआ उत्तम पुरुष निरन्तर विश्रान्ति सुख का अनुभव
करता हुआ आत्मा मेँ स्थित रहता हे