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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verses 23–26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verses 23–26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 23-26

संस्कृत श्लोक

चन्द्रलेखेव लोकस्य दृष्ट्यैवाह्लाददायिनी । अविनाभाविनी भार्या मुदितास्यानुरागिणी ॥ २३ ॥ करुणाकारणाकीर्णधना हृदयहारिणी । आनन्दजननी चास्य वयस्याऽव्यभिचारिणी ॥ २४ ॥ समतास्य मता नित्यमास्ते हृदयवल्लभा । प्रतीहारी पुरः प्रह्वा संमुखं सुखदायिनी ॥ २५ ॥ धैर्ये धर्मे च धीः साधो नित्यमाधीयते च या । सास्य धीरस्य धुर्यस्य पुरो धन्यस्य धावति ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

ही जीवन्मुक्त ज्ञानी पुरुष खाते, चलते, साँस लेते और बोलते महाअरण्यरूप लोक में सुखपूर्वक सोता है, यह महान्‌ आश्चर्य है