Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
अस्य सन्ना समं स्कन्धे सर्वदैव महौजसः ।
विषयारिजये राज्ञो मैत्री मन्त्रप्रदायिनी ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
तत्त्वज्ञानियों की वह गाढ़ी नींद कोई अलौकिक ही है
जो प्रलयकालीन मेघों के गर्जनों से तथा अंगों के छेदन-भेदनों से भी नहीं टूटती है