Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
इत्येवंपरिवारेण मित्रेण सह मन्त्रिणा ।
स्वकर्मणा व्यवहरन्न हृष्यति न कुप्यति ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसका नेत्रो को बन्ध किये बिना ही सारा विश्व
विलीन हो जाता है, वह परमार्थ से पागल (न कि मद के नशे से पागल) आत्मज्ञानी सुखपूर्वक सोता
है, यह आश्चर्य है