Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
स यथास्थितमेवास्ते विनिर्वाणमना मुनिः ।
चित्रार्पित इवाजस्रं लोके व्यवहरन्नपि ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
अहा ! सारे जगत् को निगलकर परम पूर्णता को प्राप्त हुआ आत्मवान्
पुरुष तृप्तिपर्यन्त (खूब छककर) अपरिच्छिन्न (असीम) आनन्दरस का पान कर सुखपूर्वक सोता
है