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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verses 31–32

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verses 31–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 31,32

संस्कृत श्लोक

वस्तुशून्येषु वादेषु मूकः शैलमयो यथा । निष्प्रयोजनशब्देषु परं बाधिर्यमागतः ॥ ३१ ॥ लोकाचारविरुद्धेषु शवं सकलकर्मसु । आर्याचारविचारेषु वासुकिर्वा बृहस्पतिः ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

अहा, विषयजन्य (वैषयिक) आनन्द के अभाव में भी निरतिशय आनन्द से महान्‌ आनन्दवाला अक्षय अद्वैत सुख का अनुभव कर रहा आत्मज्ञानी पुरुष जिसके अन्य आलोको से (प्रकाशो से) अप्रकाश्य आत्मा में महान्‌ प्रकाश है, सुखपूर्वक सोता है । काम, क्रोध, लोभ, मोह आदिरूप अन्धकार से रहित होने के कारण आत्मा के महाप्रकाश में आसक्ति को प्राप्त हुआ तथा अमूर्त आनन्दरस मेँ अतिशय आस्वाद युक्त आत्मवान्‌ पुरुष सुख से सोता है