Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 37
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हिन्दी अर्थ
संसारसमूहरूप स्वप्न को, ज्ञान प्राप्त कर,
प्रकट दिशाओं की तरह अपरिच्छिन्न सुषुप्तता को प्राप्त कर रहा ज्ञानी पुरुष सुख से सोता
है