Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verses 39–40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verses 39–40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 39,40
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हिन्दी अर्थ
पहले प्रविलोपन द्वारा आकाशता को प्राप्त जगत् को अव्याकृत आकाश से भी
निर्मल चिदाकाश बनाकर आत्मवान् पुरुष शब्द ओर श्वासप्रश्वास रहित सुखपूर्वक सोता हे । स्वयं
प्रत्यगात्मभूत चिदाकाश के एक कोने में स्वप्न के तुल्य इस हमारे जगत् को देख रहा
चिदाकाशकोशस्वरूप आत्मज्ञानी पुरुष सुखपूर्वक सोता है