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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 42

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जैसे जागरूक (जागे हुए) पुरुष,जिसने गाठी नींद में स्वप्न का अनुभव (७) “ज्यायानाकाशात्‌“ (आकाश से बड़ा विशाल) ऐसी श्रुति है । किया है, नींद में अनुभूत स्वप्न का बड़े प्रयत्न से स्मरण करता है वैसे ही आत्मविचाररूप सुषुप्ति में सोनेवाला आत्मज्ञानवान्‌ पुरुष अन्य के अथवा अपने अत्यन्त प्रयत्न से बहिर्मुखवृत्ति होकर बाह्यपदार्थ के परिज्ञान से आपाततः (सरसरी) शरीरधारणादि व्यवहार ऐसे ही करता है जैसे कि निरवकाशस्थान में रहने में असमर्थ आकाश दूसरे जैसे कल्पित आकाश से आकाशस्वरूप में सत्ता धारण करता है