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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 43

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 43

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

परम चिदाकाशको प्राप्त आत्मज्ञानी पुरुष आकाश के सदृश विशाल स्वरूप के ज्ञान से अत्यन्त असत्‌ होने के कारण आकाशतुल्य (शून्यरूप) जीव-जगत्‌ रूप धर्मो को प्रयत्न से देखता है, उनका ज्ञाता बनता हे