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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 44

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 44

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार जीवन्मुक्त पुरुष का अज्ञानी की दुष्टि का स्वप्न कह कर परमार्थ दृष्टि में सदा वह प्रबुद्ध है, एसा कहते है । तत्त्वज्ञानी पुरुष इस प्रकार सदा सुप्त होता हुआ भी लोक में प्रसिद्ध जाग्रत और स्वप्न में लोक की तरह ही प्रबुद्ध ओर सुप्त होकर जाग्रत ओर स्वप्न के पदार्थो के भोग में सहायभूत आगे कहे जानेवाले मित्र के साथ सदा रमता हे । उसके पश्चात्‌ सुषुप्त होकर उसके साथ ही सुषुप्ति को प्राप्त हुआ