Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 170, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 170, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 170 · श्लोक 45

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

जब तक प्रारब्ध का भोग रहता है तब तक उस मित्र के साथ क्रीड़ा कर उसके पश्चात्‌ उसकी जीवन्मुक्ति होती है, ऐसा कहते है । जीवन्मुक्त पुरुष अन्यान्य जन्मों में एकता द्वारा चिरकालतक सहवास से उत्पन्न प्रेम से मानों अपनी सारी विषमता त्यागकर समचित्त से तथा शम, दम, तितिक्षा, ज्ञान, वैराग्य ओर सन्तोष की अनुवृत्ति से मधुर आगे कहे जानेवाले चिरकाल के मित्र के साथ आयु के शेष दिनों को आगे कही जानेवाली क्रीडा के साथ परम पद मेँ (निरतिशयानन्द विदेह केवल्यपद में) विश्राम को प्राप्त होगा