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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verses 16–17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 172, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 16,17

संस्कृत श्लोक

स्मर्तव्यं भाववशतः स्मृतिर्नास्त्येव लौकिकी । स्मृत्यर्थस्त्वन्यदीयोऽस्ति सत्यात्मा त्वमिमं श्रृणु ॥ १६ ॥ भूतस्यान्तः पदार्थस्य स्मरणं स्मृतिरुच्यते । पदार्थस्तु न चैवास्ति न भूतो न भविष्यति ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

सब भूर्तो का निर्विषय चिन्मात्र ही निज स्वभाव है, ऐसा कहते है। एक विषय से अन्य विषय की प्राप्ति होने पर मध्य में प्रसिद्ध जो निर्विषय चैतन्य है वह परमात्मपद ही भूतों का निज स्वभाव हे । एक विषय से अन्य विषय की प्राप्ति होने पर मध्य में प्रसिद्ध जो निर्विषय चैतन्य है वही यह परमाकाश है । इसीमें सब कुछ प्रतिष्ठित है यानी निर्विषय चैतन्य ही सर्वाधिष्ठान भी है