Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verses 18–19
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 172, verses 18–19 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 18,19
संस्कृत श्लोक
एवं हि खल्विदं ब्रह्म परमेवाचलं यतः ।
अनादिमध्यपर्यन्तं कुतः स्मृत्यादयस्ततः ॥ १८ ॥
सर्वात्मत्वमपदार्थात्म चिद्व्योमकचनं तु यत् ।
व्यवहारेऽप्यलं शान्तं स्मृत्या तच्छब्दितं मया ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
अधिष्ठान के अनुरूप ही यह अध्यास है, ऐसा कहते हैं।
जैसे यह परमपद है वैसा ही यह सत्असत्रूप प्रपंच भी है, क्योंकि पंचभूतों से अतिरिक्त कुछ भी
नहीं है । जैसे स्व से अतिरिक्त स्वकार्यशून्यता ब्रह्म में है वैसे ही इसमें भी है। इसी अंश से इसमें
अधिष्ठानअनुरूपता है। श्रुतियों के तात्पर्य को जाननेवाले लोग रूपालोक यानी बाह्य इन्द्रियो से जन्य
विषयाभास तथा मनस्कार यानी आभ्यन्तर इन्द्रिय मन के अधीन विषयाभास ये सभी चिन्मात्ररूप परम
ब्रह्म ही हैं, ऐसा जानते हे । ये सब महासागररूपी उक्त पद की द्रवता के (जल के) आवर्त हैं