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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verses 20–22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 172, verses 20–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 20-22

संस्कृत श्लोक

तदेतत्स्मरणं नाम स्वभावकचनं हि तत् । तेनाभ्यस्तोऽथ बाह्यार्थः सादृश्यादवभासते ॥ २० ॥ यद्यत्संवेद्यते किंचित्तत्स्वभावं स्वभावयत् । तेनावभासते योऽर्थस्तस्य स्मृत्यभिधा कृता ॥ २१ ॥ अविद्यमानं भातीव यथा दृश्यं तथा स्थितिः । भातैवाविद्यमानैव मृगतृष्णा यथोद्यता ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

इससे निर्विषय चिन्मात्र से अतिरिक्त जगत्ता नहीं है यह सिद्ध हुआ, ऐसा कहते हैँ । संवित्‌ की एक देश से दूसरे देश की प्राप्ति होने पर मध्य में निर्विषय जो चैतन्य प्रसिद्ध है उससे अतिरिक्त जगत्ता कोई नहीं है । राग, द्वेष आदि भाव तथा जगत्‌ की भाव-अभाव दृष्टियाँ ये सब सद्रूप ओर भानरूप का त्याग न करते हुए इसके अंगरूप से स्थित हैं | शाखाचन्द्रदर्शन में पूर्वकोटि (शाखा) और अन्यकोटि को (चन्द्रक) छोडकर बीच में जो संवित्‌ का निर्विषय शरीर प्रसिद्ध है, वह उसका परम स्वभाव हे । वही जगद्रूप मरुमृगतृष्णा के जलमें अधिष्ठानसंज्ञक हे