Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 172, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
सर्वात्मनि स्थिताः सत्ये याः कचन्ति सुसंविदः ।
ता एवाभ्यासरूढार्थाः सादृश्यात्स्मृतयः स्मृताः ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी अभिप्राय से मैंने बार-बार निर्विषय विस्तृत अपरोक्ष चैतन्य की सर्वसाधारण प्रसिद्धि के
प्रदर्शक देशाद्देशान्तरप्राप्तौ* इस श्लोक की घोषणा की है, इस आशय से कहते है ।
कूटस्थ होने के कारण ही स्वरूप से अप्रच्युत संवित् का जाग्रत् से स्वप्न की प्राप्ति होने पर मध्य
में (सुषुप्तिदशा में) जो स्वरूप हे, पूर्वसृष्टि से पुनः सृष्टिप्राप्ति होने पर मध्य में (प्रलय में) जो संवित्
का स्वरूप है तथा इस लोकरूप प्रदेश से परलोकरूप प्रदेश की प्राप्ति में मध्य में (मूर्च्छावस्था में) जो
संवित् का स्वरूप है वह वैसे ही सदा रहता है । उसीका अज्ञानी लोगों ने जगत् यह दूसरा नाम कपोल
कल्पना से रक्खा है