Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 172, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
यद्यत्कचति सद्रूपं स्वाङ्गं सर्वात्मनः स्वतः ।
तदभ्यस्तार्थसादृश्यात्स्मृतिरित्युच्यते बुधैः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
खेद है, जो दृश्य है ही नहीं वह अस्तिरूप से स्थित
है। जो परम ब्रह्म है उसकी नास्ति है इससे बढ़कर दुःख क्या होगा ? मूढो को अभामग्यवश ही, मणि नहीं
है, कोचि हे, इस भ्रान्ति की तरह यह विपरीतता का भ्रम हुआ है, यह भाव है