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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verse 26

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 172, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 26

संस्कृत श्लोक

हेतौ लब्धेऽप्यलब्धे वा पवनस्पन्दवद्विदः । ता एवाभ्यासरूढार्थाः सादृश्यात्स्मृतयः कृताः ॥ २६ ॥

हिन्दी अर्थ

में तो ब्रह्मभाव से शून्य अतएव विपरीत जगत्‌ को कहाँ पाऊँ । मूढ जनता ने असत्‌ दृश्य को सत्‌ कहा है वह भी ब्रह्म को ही प्राप्त होती है न कि दृश्य को, क्योकि असत्‌ वस्तु प्राप्ति योग्य ही नहीं हे, यह अर्थ हे