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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verses 4–5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 172, verses 4–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 4,5

संस्कृत श्लोक

न तस्य देहचित्तादि नेन्द्रियाणि न वासनाः । सदप्येतत्सदा तस्य न किंचिदपि विद्यते ॥ ४ ॥ प्राक्तनस्य प्रजेशस्य मुक्तत्वात्कथमेव च । भूयः संभवति प्राज्ञ न स्मृतिर्न च संभवः ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

“सदेव सोम्येदमग्र आसीत्‌', यदा तमस्तन्न दिवा न रात्रिर्न सन्न चासन्‌ शिव एव केवलः, इत्यादि श्रुतियो में पहले केवल सन्मात्रशेषरूप महाप्रलय होने पर उसके पश्चात्‌ आविसृष्टि होती है यह युना गया है। उसमें "सदेव" (सत्‌ ही था) ऐसा अवधारण करने से अधिकारी परमात्मा से अन्य कारण का अभाव होने पर इस दृश्य की कहाँ से उत्पत्ति हो सकती है ? उस समय अणुमात्र भी दृश्य के बीज का (कारण का) अस्तित्व नहीं, जिससे कि फिर यह मूर्त दृश्यचक्र प्रवृत्त होता भाव यह कि उस समय, पूर्वोक्त श्रुति से विरोध होने के कारण, परमाणु आदि अन्य कारणों की कल्पना का तनिक भी अवकाश नहीं है