Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 172, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 50
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
प्रबोधकाल में जिस तरह का शुद्ध आत्मा शेष रहता है, उसको स्वीकार करने से जो जो जगत्-
कौतुक अनुभूत हुआ वह सब सुख ही होता है अप्रबोधकाल में उसका अगीकार न करने से दुःखयुक्त
जन्म. मरण, रोग आदि जो जो अनुभव में आता है वह सव दुःख ही होता है । स्वप्न में प्रबोध, अप्रबोध
आदि के समान, यह कहते है ।
जैसे "यह स्वप्न है” यों स्वप्न का परिज्ञान होने पर स्वप्न मेँ जो कुछ भी अनुभव में आया वह
सब सुख ही हो जाता है । यदि स्वप्न का “यह स्वप्न हे" यों परिज्ञान नहीं हुआ तो दुःखयुक्त सब
वृत्त दुःखप्रद ही होते हैं वैसे ही प्रबोधकाल में (ज्ञानकाल में) जिस प्रकार के निष्कल निरंजन आत्मा
का शेष रहता है उसका अंगीकार करने से अनुभूत जगत् आदि कौतुक क्षणभर में सुखकारक ही
होता है, अज्ञानकाल में उसका अंगीकार न करने से दुःखपूर्ण जन्म, जरा, मरण आदि दुःखदायक
ही होते हैं