Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verses 48–49
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 172, verses 48–49 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 48,49
संस्कृत श्लोक
ब्रह्मेदमाकचति चारुजगत्स्वरूपं तच्चैकमेव कचनाकचनात्मनिष्ठम् ।
दृश्याभमप्यमलमेव नभः प्रशान्तं नित्योदितं प्रलयसर्गमयोदयात्म ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
तब उनका तात्पर्य किसमें है ? ऐसा प्रश्न होने पर कहते हैँ ।
आदि सृष्टि से ही एकमात्र चिन्मात्र परमाकाश महासत्ता रूप से अपने में स्थित है, इस विषय में
तत्त्ववेत्ताओं के सर्वथा परिपूर्ण आत्मा में अनुभव प्रमाण है । वही अनुभवरूप सर्वव्यापिनी चिति सर्वत्र
स्थित हे । उसीने निज आत्मा में अज्ञानियों के लिए जगत, जीव आदि संज्ञाएँ की हैं