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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verse 47

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 172, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 47

संस्कृत श्लोक

करोति पृथ्व्याद्यभिधाः पश्चात्सत्यार्थदा इव । न स्मृत्यात्म न साकारं पृथ्व्यादीनामसंभवात् । न भ्रान्तिर्न विवर्तादि जगद्ब्रह्मात्म केवलम् ॥ ४७ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे पृथ्वी आदि पदार्थ चिद्रूप ही हैं चिद्रूप से अतिरिक्त नहीं हैं तो अन्तयमिीरूप से चित्‌ में उनका साक्षी होना तथा उन्हें प्रेरित करना कैसे घट सकता है 2 इस प्रश्न पर कहते है। हे निष्पाप श्रीरामजी, उपदेश के लिए लौकिक परिणाम आदि को स्वीकार कर प्रवृत्त हुई उक्तियों में परमार्थतः परिणामपरता की गन्ध भी नहीं है । पृथिवी आदि में अन्तर्यामी होकर परमात्मा सबका साक्षी तथा परिणाम का प्रेरक है, इत्यादि उक्तियाँ लौकिक व्यवस्था को मानकर उपदेशार्थ प्रवृत्त हैँ । वास्तव में वे परिणामपरक नहीं है, यह भाव है