Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 172, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 172, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 172 · श्लोक 56
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हिन्दी अर्थ
जो अज्ञानावरणशून्य विद्वान् है उसका अन्तःकरण सदा समाधिसुख का अनुभव करता हे, यह शत्रु हे,
यह मित्र हे आदि विकल्पों की उसमें गन्धतक नहीं रहती, आत्मसुखरूपी सार वस्तु ही उसमें प्रचुरमात्रा
में रहती है और वह सदा परमशान्तिरूपी अमृत से तृप्त रहता हे