Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 173, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
सर्वानुभवरूपस्य तथा सर्वात्मनोऽप्ययम् ।
अनन्तस्यात्मतत्त्वस्य देहेऽपि किमहंग्रहः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
उसका न शरीर है और न उसे स्मृति हो सकती है, यह कथनपूर्वक स्मृतितत्त्व का वर्णन ।
यदि कोई कहे कि श्रुतियो में यह जगत् विधाता द्वारा रचित युना जाता है - “सूयचन्दमसौ
धाता यथापूर्वमकल्पयत् । दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः“ (विधाता ने सूर्य और चन्द्रमा की
पूर्वकल्पनानुसार सृष्टि की । द्युलोक, भूलोक, अन्तरिक्षलोक और स्वर्ग की भी पूर्ववत् सृष्टि की) ।
ऐसी परिस्थिति में जगत् स्वप्न की भाँति चिन्मात्रस्फुरण कैसे हो सकता है ? इस प्रश्न का निवारण
करने के लिए विधाता के संकल्प और संकल्पमय जगत् चिन्मात्र ही हैं, यह वर्णन करने के लिए
उपक्रम करते हैँ ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, अनादिकाल से जीवन्मुक्त होने के कारण ही आदि
प्रजापति पृथिवी आदि से रहित निरावरण चिदाकाश ही है । उसे मैं केवल मन की समष्टिरूप हिरण्यगर्भ
ही समझता हूँ ओर मन संकल्पवृक्ष के समान चित्स्फुरणमात्र ही है, यह प्रसिद्धि हे, यों उसकी चिन्मात्रता
में कोई सन्देह नहीं रहा, यह भाव हे
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ इकहत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक सौ बहत्तरवाँ सर्ग॑ विधाता केवल मनरूप है, उसका संकल्प जगद्भ्रान्ति हैँ ।