Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 173, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
चेतनाचेतनात्मैकं तथा सर्वात्मनो वपुः ।
जङ्गमं स्थावरमयं किंतु नित्यमनाकृति ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
ठीक है, हम कल्पनारूप भ्रान्ति से जन्य निरर्थक स्मृति का खंडन नहीं करते परन्तु सत्य पदार्थों
के अनुभव जन्य संस्कार से उत्पन्न स्मृति का खंडन करते है । यदि उक्त स्मृति हो तो पूर्व अनुभव के
विषय सत्य पदार्थो मे स्वविषय अनुभव के संस्कार से जन्य स्मृति द्वारा इस कल्प के पदार्थो के प्रति
अन्वय व्यतिरेकवश कार्यकारणभाव के सिद्ध होने पर अपने निर्माता की सत्ता से सत्तावान् जगत् के
सत्य होने पर ब्रह्मअद्वैत सिद्धान्त को बाधा पहुँचेगी, यो श्रीवसतिष्ठजी समाधान करते है ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, पृथिवी आदि दृश्य के परमार्थतः सत् होने पर
अन्वयव्यक्तिरेकवश सम्पन्न (सिद्ध) हुई स्मृतिमूलक यह (लोकिकन्याय सिद्ध) कार्यकारणता हो
सकती हे, किन्तु द्वारभूतस्मृति का ही सम्भव नहीं है