Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 173, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
यथास्थितं शाम्यतीदं सम्यग्ज्ञानवतो जगत् ।
स्वप्ने स्वप्नपरिज्ञातुर्यथा दृष्टार्थसंभ्रमः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
स्मृति का क्यो संभव नहीं है ? इस प्रश्न पर कहते हैं।
नेह नानास्ति किंचन" (यहाँ भेद कुछ भी नहीं है), "एकमेवाद्वितीयम्" (सजातीय, विजातीय
और स्वगत भेद शून्य ब्रह्म ही हे), “अथात अदेशो नेति नेति" (नेति नेति "यह नहीं यह नहीं' ऐसी
श्रुति का आदेश है) “यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानाति स भूमा" (जहाँ पर दूसरे
को नहीं देखता, दूसरे को नहीं सुनता और दूसरे को नहीं जानता, द्वैतज्ञान नहीं रहता वह भूमा है),
"तदेतद् ब्रह्ापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्य मयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभू:: ( वह यह ब्रह्म जो आत्मा है, इसका
न कोई कारण है, न कार्य हे, न इसके मध्य में कोई अन्यजातीय है ओर न इसके कोई बाहर है, यह
आत्मा ही निरन्तर ब्रह्म है जो कि सामान्यरूप से सबका अनुभव करता है), “वाचारम्भणं विकारो
नामधेयम्” (विकार वाचारम्भण नाममात्र है) इत्यादि श्रुतियों द्वारा सकल प्रपंच का निषेध होने तथा
वैसी ही तत्त्वज्ञानियों की अनुभूति होने से जहाँ ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त दृश्य कुछ भी नहीं है वहाँ
पर स्मृति का सम्भव कैसे, किस प्रकार का ओर कहाँ से होगा ? ऐसी स्थिति में "सह सिद्धं चतुष्टयम्”
इस स्मृतिवचन द्वारा प्रदर्शित प्राक्तन स्वाभाविक प्रपंच तत्त्वज्ञानी विराट् के तत्त्वज्ञान से बाधित होकर
मिथ्या ही हो चुका, अतएव वह प्रजापति की पूर्वस्मृति का आधान करने और उसके द्वारा सत्य सृष्टि
के प्रति कारण होने के लिए समर्थ नहीं है, यह भाव है