Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 173, Verses 13–15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 173, verses 13–15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 173 · श्लोक 13 ,14
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्राकाशमेवेदं न द्रष्टास्ति न दृश्यता ।
इति मौनमलं स्वप्नद्रष्टुर्यत्सा प्रबुद्धता ॥ १३ ॥
कल्पकोटिसहस्राणि सर्गा आयान्ति यान्ति च ।
त एवान्ये च चिद्व्योम्नि जलावर्ता इवार्णवे ॥ १४ ॥
करोत्यब्धौ यथोर्म्यादौ नाना कचकचं वपुः ।
चित्करोति तथा संज्ञाः सर्गाद्याश्चेतने निजे ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
परमार्थरूप से उत्पन्न होकर विद्यमानता
को प्राप्त हुई वस्तु का प्रत्यक्षादि प्रमाणो से अनुभव कर कालान्तर में उसका जो स्मरण है उसे ही
शास्त्रज्ञ लोग स्मृति कहते हैं । जहाँ दृश्य ही नहीं हे वहाँ ये स्मृति आदि कल्पनाएँ कहाँ से हो सकती
हैं ? इस दृश्य का निश्चय रूप से सर्वदा अत्यन्त अभाव ही है, क्योकि सब कुछ ब्रह्म ही है, इत्यादि
सत्यार्थक श्रुतियाँ है । ऐसी परिस्थिति में स्मृतिकल्पनाएँ कैसे हो सकती हैं या स्मृति की सत्यार्थक
कल्पनाएँ कैसे हो सकती हैं यों सत्यार्थ:: का कल्पना में अन्वय करना चाहिये । या पूर्वोक्त अनुवाद
के अनुसार “सर्व ब्रह्मेति सत्यार्था: श्रुतयः सन्ति“ यों योजना करनी चाहिये । असत् भ्रान्तिकल्पित
ओर तत्त्वज्ञान से बाधित की स्मृति नहीं हो सकती है, यह भाव है